Kēdārnāth Mandir (
Kedarnath Temple) is one of the holiest
Hindu temples dedicated to the god
Shiva and is located on the Garhwal
Himalayan range near the
Mandakini river in
Kedarnath,
Uttarakhand in
India. Due to extreme weather conditions, the temple is open only between the end of April (Akshay trutya) to
Kartik Purnima
(the autumn full moon, usually November) every year. During the
winters, the vigrahas (deities) from Kedarnath temple are brought to
Ukhimath and worshipped there for six months. Lord
Shiva is worshipped as Kedarnath, the 'Lord of Kedar Khand', the historical name of the region.
The temple is not directly accessible by road and has to be reached by a 14 kilometres (8.7 mi) uphill trek from
Gaurikund. Pony and manchan service is also available. The temple is believed to have been built by
Pandavas and revived by
Adi Sankaracharya[1] and is one of the twelve
Jyotirlingas, the holiest Hindu shrines of Shiva. Pandavas were supposed to have pleased Shiva by doing penance in
Kedarnath. The temple is also one of the four major sites in India's
Chota Char Dham pilgrimage of Northern Himalayas.
Kedarnath was the worst affected area during the
2013 flash floods in North India.
The temple complex and surrounding areas suffered extensive damage.
However, aerial photos showed that the temple itself was still standing
among the surrounding debris.
North India Floods 2013
Pilgrims Recount India Flood Ordeal
In June 2013, the North
Indian states of
Himachal Pradesh and
Uttarakhand (
Kumaon,
Garhwal and their adjoining
Terai or
Bhabhar piedmonts), the adjoining Western Nepal regions of
Doti,
Humla, etc. besides parts of
Haryana,
Delhi and
Uttar Pradesh, experienced heavy rainfall that triggered devastating floods and landslides. As of 22 June 2013, several sources state that more than 1000 people have died with many more missing.
[1] Damage to bridges and roads left over 70,000 pilgrims and tourists trapped in various places,
[3][4][5] of whom, many were then rescued.
[6][7] As of 23 June 2013, about 22000 people are said to be still stranded.
[8][7]
As of 22 June 2013, the death toll in Uttarakhand was reported to be
1000, with several more missing and more than 60,000 tourists and
pilgrims stranded.
[1][9][10][11][12] By 23 June 2013, some sources claimed that the death toll could even rise to 5000
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उत्तराखंड में बारिश और भूस्खलन से आई तबाही ने केदरानाथ मंदिर को
बाहर और अंदर से भी भारी नुकसान पहुंचाया
है। मंदिर के अंदर भी मलबा पहुंचा है तो बाहर से सिर्फ मंदिर का गुंबद ही
बचा है। मंदिर की बाकी चीजें मलबे में दब गई हैं। तबाही की सुबह कई लोगों
ने मंदिर के गर्भगृह में पहुंचकर जान बचाई। कुछ लोग मंदिर के गर्भगृह
जाते-जाते मौत के मुंह में समा गए। जो लोग गर्भगृह में समय से नहीं पहुंच
सके तो उन्होंने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। मंदिर के अंदर की ताजा
तस्वीरें बताती हैं कि
बाहर की तबाही का असर अंदर तक हुआ है।
उत्तराखंड में
बचाव का काम और मुश्किल होने
वाला है। शनिवार को खराब मौसम के कारण बचाव का काम बाधित हुआ ही, सोमवार
से इस काम के ठप पड़ने का डर है। सोमवार से बारिश का अनुमान है और
बारिश में बचाव का काम बिल्कुल नहीं हो पाएगा।
ऐसे में लाशों के मलबे में ही सड़ जाने का खतरा बढ़ गया है। लाशें तैर कर
गंगा में सहारनपुर, मेरठ तक आ रही हैं। सरकार जो लाशें निकाल पा रही है,
उसी के आधार पर मौतों का आंकड़ा जारी कर रही है। उसके मुताबिक शुक्रवार तक
550 लोगों की मौत का आंकड़ा जारी किया गया, लेकिन असल में मरने वाले हजारों
में बताए जा रहे हैं।
अब, जब सैलाब उतरा है तो केदारनाथ मंदिर के आस पास और मंदिर के प्रमुख द्वार पर
लाशें बिछी पड़ी दिखाई
दी रही हैं। केदारनाथ और उसके आसपास के रहने वाले लोगों का कहना है कि हर
तरफ लाशें बिखरी पड़ी हैं। कुत्ते व गिद्ध उन्हें नोंच रहे हैं। लोगों
का कहना है कि सैलाब न सिर्फ घरों को, बल्कि आसपास की छोटी छोटी
बस्तियों को भी अपने साथ बहा ले गया। अगर स्थानीय लोगों की बातों पर
भरोसा करें तो अब तक हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। आगे देखिए ऐसी ही
कुछ
हृदयविदारक तस्वीरें जो उस वक्त की तबाही को साफ नुमायां करती हैं और बताती हैं कि कैसे केदारनाथ में मंदिर की चौखट पर मौत के मुंह में समा गए लोग ।
केदारनाथ की कांग्रेसी विधायक ने कहा है कि केवल उनके क्षेत्र में कम से कम चार हजार लोग मरे हैं।
अब यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि
मलबे के ढेर में जहां-तहां दफन हुए शव निकल भी सकेंगे या नहीं और अगर निकल पाए तो उनकी
शिनाख्त हो सकेगी या नहीं? चश्मदीदों के मुताबिक पिछले दिनों आई आपदा के वक्त केदार घाटी में
30 हजार से ज्यादा श्रद्धालु और स्थानीय लोग मौजूद थे। सरकारी
मशीनरी अभी यह बताने की स्थिति में भी नहीं है कि मलबे का ढेर हटाने का
काम कब शुरू हो सकता है। केदार घाटी में बड़े-बड़े बोल्डर वाले मलबे के ढेर
से शवों को निकालना आसान काम नहीं है।
उत्तराखंड में मची तबाही (पढ़ें 25 खौफनाक कहानियां) के बारे में जो खबरें आ रही हैं,
वास्तविक स्थिति उससे कहीं
भयंकर लगती है। केदारनाथ से बच कर सुरक्षित स्थानों पर पहुंचे लोगों ने वहां की तबाही की तस्वीरें सोशल साइट्स पर शेयर करनी शुरू कर दी हैं।
इन तस्वीरों से पता चलता है कि किस तरह से लोग बचने के लिए मंदिर तक भागे, लेकिन मंदिर तक पहुंचने से
पहले ही सैलाब उन्हें बहा ले गया।
ऐसी बड़ी आपदा में भी राजनेता सियासत करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
सहस्रधारा हेलिपैड पर शुक्रवार को कांग्रेसी-भाजपाई आपस में उलझने में
मशगूल रहे। हेलिकॉप्टर से उतर रहे यात्रियों से अगर पहले भाजपाई मिल लिए,
तो कांग्रेसियों को नागवार गुजरा। इसी तरह अगर पहले कांग्रेसी पहुंच गए तो
भाजपाई नाखुश हो गए। राजनेताओं की इस कलह ने पुलिस-प्रशासन की मुश्किलें और
बढ़ा दी हैं। पुलिस यात्रियों और उनके परिजनों के साथ-साथ इनको भी संभालने
में जुटी रही। भाजपा के एक विधायक वहां बीते दो दिन से डटे हैं तो
कांग्रेस के भी एक नेता भी वहां पहुंच रहे हैं।
शुक्रवार को दोनों दलों के लगभग एक दर्जन नेता अपने समर्थकों समेत आ
पहुंचे। इसके बाद एक-दूसरे को नीचा दिखाने का ‘खेल’ शुरू हुआ। हेलिपैड पर
जब भी कोई हेलिकॉप्टर यात्रियों को लेकर उतरता, तभी भाजपाई और कांग्रेसी
नियंत्रण रेखा पार कर ‘मदद’ के हाव-भाव लेकर पहुंच जाते। जब पुलिस उन्हें
हटाने की कोशिश करती तो वे भिड़ जाते। एक कांग्रेसी नेता और एनएसयूआई में
शामिल उनकी बेटी का हाल तो सबसे बुरा रहा। दोनों ने हेलीपैड पर जमकर विवाद
किया। पुलिस-प्रशासन ने उन्हें हटाने की कोशिश की तो वह अड़ गए।
उत्तराखंड: अमेरिकी पर्यटकों को निकालने के दिल्ली से गया खास निर्देश, भारतीय अब भी लापता
मौसम विभाग के अधिकारियों का कहना है कि उत्तराखंड सरकार को भारी बारिश की आशंका के बारे में दो दिन पहले यानी १४ जून को ही
आधिकारिक सूचना दे दी गई थी।
बड़ी आपदा की आशंका के
मद्देनजर ही राज्य सरकार के तमाम विभागों और पहली बार मुख्यमंत्री
कार्यालय को भी आगाह किया गया था। बुधवार को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन
प्राधिकरण (एनडीएमए) की समीक्षा बैठक में
पहली बार मौसम विभाग ने इसकी लिखित पुष्टि भी की है।
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Effects Of Flood In Local Houses In Uttarakhand Due To Monsoon
उत्तराखंड:
केदारनाथ मंदिर का निर्माण करीब 12 सौ साल पहले पत्थरों व लकड़ी से किया
गया था। गर्भगृह का निर्माण पत्थर व मंडप का निर्माण लकड़ी से हुआ। कत्यूरी
शैली में बने मंदिरों का इतिहास करीब 12 सौ साल साल पुराना है।
दो चीजों को आपस में इस तरह से जोड़ा जाता है कि एक हिस्सा-दूसरे में समा
जाए। साथ ही पहली वस्तु कम से कम दो ओर से उसे बाहर से जकड़कर रखे। भवन
निर्माण में दो तरीकों से इसका इस्तेमाल किया जाता है। नींव की इंटरलॉकिंग
को अंडर इंटरलॉकिंग और ऊपर से इंटरलॉकिंग को आउटर इंटरलॉकिंग कहते हैं।
आउटर इंटरलॉकिंग के लिए सरिए या लोहे की शीट का इस्तेमाल होता है। जो दो ओर
से पत्थर के सिरों को जकड़ सके। इस तकनीक का उपयोग इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों
के निर्माण में भी किया जाता है।
मंदिर के गर्भगृह और बाहरी हिस्से में अब भी कई लाशें पड़ी हुई हैं।
उन्हें वहां से नहीं हटाया जा सका है। अभी प्रशासन जिंदा बचे लोगों को
निकालने पर ध्यान दे रहा है।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने कहा है कि केदारनाथ तक जाने
वाले रास्ते को ठीक करने के साथ ही मंदिर में हुई टूट-फूट को ठीक किया
जाएगा। यहां से लाशें हटाकर मंदिर में पूजा का काम शुरू किया जाएगा।
यह आपदा सुबह के समय आई जब लोग भारी संख्या में मंदिर को ओर बड़ रहे थे।
इन लोगों को रास्ते में ही आया मलबा और तेज रफ्तार पानी अपने साथ बहा कर
ले गया। वही कुछ बचने में कामयाब रहे जिन्हें कोई ओट मिल गई थी या जो मंदिर
के अंदर थे।
मंदिर के भीतरी हिस्से में जान बचाने के लिए छुपे लोगों का कहना था कि
उन्हें ये डर भी सता रहा था कि कहीं पुरानी इमारत गिर न जाए लेकिन सदियों
पहले बनी इमारत मजबूती से खड़ी रही।
केदारनाथ मंदिर के भीतर से बचकर निकले लोगों की कहानियां दिल दहला देने
वाली हैं। इन लोगों की असल परेशानी यहां से निकलने के बाद शुरू हुई। कई
लोगों ने तो आबादी तक पहुंचने में अपनी जान गंवा दी।
सुपरमून: रविवार की रात किस शहर में कैसा दिखा चांद, तस्वीरों में देखें
उत्तराखंड में भले ही रविवार की रात भी लोगों के लिए भारी रही, लेकिन दुनिया के दूसरे शहरों में लोगों ने सुपरमून का
खूबसूरत नजारा देखा।
रविवार रात को आसमान में दिखे चमकदार चांद को 2013 के सुपरमून का नाम दिया
गया था। सुपरमून अथवा पेरिजी मून को सीधे नंगी आंखों से भी देखा दा सकता
है। भारतीय समय के अनुसार यह शाम 4.41 मिनट से दिखना शुरू हुआ। पिछले साल
छह मई 2012 को सुपरमून देखा गया था।
वैज्ञानिकों के अनुसार सुपरमून उस स्थिति को कहते हैं जब चांद अपनी
परिक्रमा के दौरान पृथ्वी से सबसे नजदीक होता है और पृथ्वी से चांद और सूरज
एक-दूसरे से उल्टे दिशा में होते हैं जिसके कारण पूरा चांद दिखता है। यह
चांद सबसे ज्यादा चमकदार और बड़ा दिखता है। यह चांद रोजाना के चांद की
तुलना में 14 प्रतिशत अधिक चमकीला रहता है। वैज्ञानिकों ने इस अफवाह को गलत
बताया था कि सुपरमून के कारण कोई प्राकृतिक आपदा हो सकती है।
सुपरमून नाम का शब्द 30 साल पहले खगोल वैज्ञानिक रिचर्ड नैले ने दिया
था। हालांकि सालों तक इस शब्द का इस्तेमाल खगोल शास्त्र में नहीं किया गया।
खगोल वैज्ञानिक इसे पेरिजी मून कहते हैं, लेकिन दो सालों में सुपरमून वर्ड
लोगों के बीच में आसान नाम के तौर पर लोकप्रिय हो गया है।
फोटो- काहिरा में सुपरमून के निकलने के समय आसमान साफ था। पीले रंग के बल्बों के पास कुछ ऐसा नजर आ रहा था सुपरमून।
फोटो- न्यू जर्सी में एक टेंट के पास से ली गई सुपरमून की तस्वीर। आम दिनों के मुकाबले यह चांद 14 गुना ज्यादा चमकीला था।
‘एलबम पेज वार्निग ’ तक दी गई थी
मौसम के कहर की पूर्व जानकारी मिलने के बाद उत्तराखंड सरकार को सिर्फ
सूचित ही नहीं किया गया था, बल्कि ‘एलबम पेज वार्निंग’ तक दी गई थी। मौसम
विभाग के शब्दावली का ये शब्द सबसे गंभीर मामलों में ही इस्तेमाल किया जाता
है। इसका मतलब यह है कि मौसम के बारे में विभाग सिर्फ अनुमान नहीं लगा रहा
था। उसे एकदम पक्की जानकारी थी कि इस बार बारिश से कहीं ज्यादा कहर बरस
सकती है।
कैसे जाने बारिश के भविष्यवाणी को?
पूर्वानुमान की शब्दावली वर्षा मिमी प्रति सेकेंड
हल्की बारिश २.५ - ७.५
मध्यम बारिश ७.६ - ३५.५
सामान्य बारिश ३५.६ - ६४.४
भारी बारिश ६४.५ - १२४.४
बहुत भारी बारिश १२४.५ - २२४.४
अत्यधिक भारी बारिश २४४.५ से ज्यादा
हिमालय में 8000 झीलें कर सकती हैं विनाश
नेपाल स्थित इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटिग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट द्वारा
हिंदूकुश हिमालय में ऐसी झीलों के बनने और इनके फटने के खतरे को लेकर किए
गए एक अध्ययन में ऐसे तथ्य सामने आए हैं जो चिंता का विषय हैं। इस
अध्ययन के मुताबिक हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में 8000 ग्लेश्यिर की झीलें
हैं, इनमें 200 बेहद खतरनाक हैं। इसके बावजूद यहां कोई चेतावनी सिस्टम
नहीं है। उत्तराखंड, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर सहित हिमालय क्षेत्र में आने
वाले इन राज्यों में हाल में अतिवृष्टि की कई घटनाएं सामने आई हैं।
हिमालय के ग्लेशियर बेहद संवेदनशील माने जाते हैं। अपेक्षाकृत निचले भागों
में इन ग्लेशियरों पर मानसून के दौरान बर्फ जमती है और गरमियों में पिघलती
है। ऊंचे पहाड़ों पर स्थित ग्लेशियरों पर सर्दियों में बर्फ जमती है जबकि
गरमियों में पिघलती है। हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र का मैदानी इलाकों के लिए
काफी महत्व है। बर्फ पिघलने से दुनिया की बड़ी नदियों के लिए बड़े पैमाने
पर पानी की आपूर्ति होती है। उत्तराखंड में करीब 968 ग्लेशियर गंगा बेसिन
में गिरते हैं और 4660 से अधिक ग्लेशियर सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों में
पानी देते हैं। रावी, ब्यास, चिनाब और सतलज नदियों के लिए जल 1,375
ग्लेशियरों से आता है जबकि 611 ग्लेशियर तीस्ता और ब्रह्मपुत्र बेसिन
में गिरते हैं और इनका सालाना 50-70 फीसदी पानी का योगदान होता है।
भारतीय हिमालयी क्षेत्र में 1926 में पहली बार ग्लेशियर झील फटने से बाढ़
आई थी। जम्मू कश्मीर में शियोक ग्लेशियर से आई इस बाढ़ की चपेट में आकर
अबुदान गांव सहित आसपास का 400 किलोमीटर का इलाका बर्बाद हो गया था। 4
अगस्त, 1985 को माउंट एवरेस्ट चोटी के निकट समुद्र तल से करीब 4,385 मीटर
ऊंचाई पर स्थित ग्लेशियर से बनी दिग त्शो झील अचानक फट गई। अगले चार घंटों
में झील से 80 लाख घन मीटर पानी बह निकला। तेजी से बहती जलधारा के रास्ते
में जो भी आया, उसने बर्बाद कर दिया। वहीं, हैदराबाद स्थित नेशनल रिमोट
सेंसिंग सेंटर के वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट के मुताबिक 1981 और 1988 में
हिमाचल प्रदेश के शौन गैरांग ग्लेशियर से बनी कई झीलें अचानक खाली हो गई
थीं। ऐसे में भारतीय हिमालयी क्षेत्र पर खासा रिसर्च की जरूरत है।
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के पूर्व डिप्टी डायरेक्टर जनरल वी के
रैना कहते हैं कि ग्लेशियरों के जानकार मौके पर नहीं जाना चाहते हैं, इस
वजह से असली हालात की जानकारी नहीं मिल पाती है। ग्लेशियर झीलों पर
निगरानी रखने के लिए वहां नियमित दौरा करना होगा और इन पर नजर रखनी होगी।
रैना कहते हैं, 'यह एक व्यावहारिक दिक्कत है। आखिर 10 हजार की सैलरी में
कोई हिमालय के दुर्गम इलाकों में क्यों जाना चाहेगा? हम इसलिए ऐसा करते
हैं क्योंकि हमें हिमालय से बेहद लगाव है लेकिन हम हर किसी से ऐसी उम्मीद
नहीं कर सकते हैं।”
उनका कहना है कि ग्लेशियरों के जानकार ज्योग्राफिक इंफोर्मेशन
सिस्टम पर आधारित अध्ययनों से मिले आंकड़ों के आधार पर गलत चेतावनी भी
जारी कर देते हैं। वो मौके पर भी नहीं जाते हैं। वह कहते हैं कि सरकार के
पास फंड की कोई कमी नहीं है लेकिन इसका सही इस्तेमाल नहीं होता है। रैना
कहते हैं, 'आर्मी वालों की तरह उन्हें सियाचिन भत्ता मिलता है। सरकार को
ग्लेशियर भत्ता भी देना चाहिए ताकि वैज्ञानिक मौके पर दौरा कर सकें और
ग्लेशियर की गतिविधियों को रिकॉर्ड कर स
केदार का अर्थ कीचड़ और दलदल भी :
केदार शब्द का अर्थ दलदल अथवा कीचड़ है। केदारपुरी ऐसी भूमि में पाई
जाती है जो प्राय चलते समय पांव के तले दलदलाती है। वह भूमि जलमय है इसी से
तीर्थ का नाम केदार और शिवजी के नाम केदार नाथ हुआ।
मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने बताया, ‘केदारनाथ को अब तीर्थयात्रियों से
पूरी तरह से खाली करा लिया गया है और अब बद्रीनाथ से तीर्थयात्रियों को
निकाला जाएगा, जहां तकरीबन 8,000 लोग फंसे हुए हैं.
सामने पहाड़ी नाला गरज रहा था, आईटीबीपी के जवानों ने उन्हें निकालने के
लिए रस्सियों का सहारा लिया. उफान मारते पानी के ऊपर से लोग रस्सियों पर
लटक-लटक कर निकले. उन्हें बड़े-बड़े पत्थर और चट्टानों से भी होकर गुजरना
पड़ा.
उत्तराखंड में टिहरी-श्रीनगर मार्ग पर स्थित घनसाली में भागीरथी नदी में
पानी अभी भी विकराल रूप धारण किए हुए है. घनसाली के घुत्तु क्षेत्र में
अनाज के सरकारी गोदाम बह गए हैं, जिससे इलाके में खाद्यान्न संकट पैदा हो
गया है.
इन तीर्थयात्रियों से परिजनों का संपर्क बीते 15 जून से टूट चुका है.
समाचारों में जल प्रलय की तबाही देखकर परिजन हताश और निराश हैं. घर की
महिलाओं और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है.
उत्तराखंड के जिन इलाकों में हेलीकॉप्टर नहीं पहुंच सकते, वहां लोग जान पर
खेलकर अपनी जान बचा रहे हैं. चमोली में सैकड़ों की तादाद में फंसे लोगों को
काफी मशक्कत से निकाला गया.
बस तबाही, तबाही और तबाही. देवभूमि केदारनाथ में कुदरत का ऐसा कहर बरपा कि
पूरा का पूरा शहर श्मशान बन गया. खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसी देवभूमि अब
मलबे में तब्दील हो चुकी है.
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पूरा का पूरा शहर श्मशान बन गया. खूबसूरत पहाड़ों के बीच बसी देवभूमि अब
मलबे में तब्दील हो चुकी है.
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समाचारों में जल प्रलय की तबाही देखकर परिजन हताश और निराश हैं. घर की
महिलाओं और बच्चों का रो-रो कर बुरा हाल है.
हेमकुंड में भी जबरदस्त रेस्क्यू ऑपरेशन हुआ. यहां पर यात्री कई दिनों से
फंसे हुए थे. बचकर निकल जाने का कहीं रास्ता नहीं था. जैसे-तैसे रस्सियों
का सहारा लेकर जवानों ने उन्हें सुरक्षित निकाला.
उत्तराखंड में टिहरी-श्रीनगर मार्ग पर स्थित घनसाली में भागीरथी नदी में
पानी अभी भी विकराल रूप धारण किए हुए है. घनसाली के घुत्तु क्षेत्र में
अनाज के सरकारी गोदाम बह गए हैं, जिससे इलाके में खाद्यान्न संकट पैदा हो
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